पितरों की मुक्ति एवं परिवार की सुख-समृद्धि हेतु वैदिक रीति से संपन्न कराई जाने वाली सभी प्रमुख पूजाएं
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पूर्वजों को पिंड अर्पण कर पितृ ऋण से मुक्ति एवं आत्मा की शांति हेतु मुख्य वैदिक अनुष्ठान।
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कुंडली में पितृ दोष के दुष्प्रभावों को शांत कर पारिवारिक बाधाओं से मुक्ति।
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अकाल मृत्यु प्राप्त पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु विशेष वैदिक कर्मकांड।
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बिहार राज्य में स्थित गया जी भारत के सबसे पवित्र एवं प्राचीन तीर्थ स्थलों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार स्वयं भगवान विष्णु ने गयासुर राक्षस को वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति गया जी आकर अपने पूर्वजों का पिंड दान एवं श्राद्ध कर्म करेगा, उसके पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होगी।
यही कारण है कि प्रतिवर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी एवं पूर्वजों की आत्मा की शांति हेतु गया जी आते हैं। यहां फल्गु नदी के तट पर, विष्णुपद मंदिर परिसर में तथा अक्षयवट के नीचे किया गया पिंड दान अक्षय फल देने वाला माना जाता है।
गरुड़ पुराण एवं वायु पुराण सहित अनेक धर्मग्रंथों में गया जी को पितृ मोक्ष हेतु सर्वश्रेष्ठ स्थान बताया गया है। मान्यता है कि गया जी में किया गया श्राद्ध कर्म भारत के किसी भी अन्य तीर्थ स्थल की तुलना में अधिक फलदायी एवं स्थायी होता है — क्योंकि यहां स्वयं भगवान विष्णु के चरण (विष्णुपद) स्थित हैं।
यहां पिंड दान करने से पितरों को तीन पीढ़ियों तक तृप्ति मिलती है और परिवार पितृ ऋण से मुक्त होता है। इसीलिए हिन्दू धर्म में यह मान्यता है कि जीवन में एक बार गया जी आकर पूर्वजों के लिए पिंड दान अवश्य करना चाहिए, चाहे अन्य किसी तीर्थ पर श्राद्ध किया गया हो या नहीं।
पिंड दान एक प्राचीन वैदिक अनुष्ठान है जिसमें दिवंगत पूर्वजों को चावल, जौ का आटा, तिल एवं शहद से बने "पिंड" अर्पित किए जाते हैं
चावल, जौ का आटा, काला तिल, शहद एवं शुद्ध घी से बनाया गया गोला जो पूर्वजों के प्रतीक स्वरूप अर्पित किया जाता है।
वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ संकल्प लेकर, स्नान-शुद्धि के पश्चात पंडित जी के मार्गदर्शन में पिंड अर्पण किया जाता है।
शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति पर तीन ऋण होते हैं — देव ऋण, ऋषि ऋण एवं पितृ ऋण। पिंड दान से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार गयासुर नामक एक अत्यंत पवित्र असुर था, जिसके शरीर के स्पर्श मात्र से पापी भी मोक्ष प्राप्त कर लेते थे। इससे स्वर्ग में हाहाकार मच गया क्योंकि पापी लोग भी बिना कर्मफल भोगे मोक्ष पाने लगे।
देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने गयासुर से यज्ञ हेतु अपना शरीर स्थिर रखने का वचन मांगा। गयासुर की देह इतनी विशाल थी कि उस पर देवताओं ने यज्ञ संपन्न किया और अंत में भगवान विष्णु ने अपने चरण उसके सिर पर रखकर उसे सदा के लिए वहीं स्थिर कर दिया — यही स्थान आज "विष्णुपद मंदिर" के नाम से प्रसिद्ध है।
गयासुर ने अंतिम इच्छा के रूप में यह वरदान मांगा कि जो भी व्यक्ति इस पावन भूमि पर अपने पूर्वजों का पिंड दान करेगा, उसके पितरों को अवश्य मोक्ष प्राप्त होगा। भगवान विष्णु के इसी वरदान के कारण गया जी आज संपूर्ण विश्व में पितृ मोक्ष का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है।
पिंड दान एवं श्राद्ध कर्म हेतु गया जी के यह छह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण एवं पवित्र माने जाते हैं
भगवान विष्णु के पावन चरण चिन्ह स्थित इस मंदिर में मुख्य पिंड दान अनुष्ठान संपन्न होता है।
तर्पण एवं जलांजलि हेतु पवित्र फल्गु नदी का तट, जहां पूर्वजों को जल अर्पित किया जाता है।
अमरत्व का प्रतीक यह वट वृक्ष, जहां किया गया पिंड दान अक्षय एवं शाश्वत फल प्रदान करता है।
अकाल मृत्यु प्राप्त आत्माओं की शांति हेतु नारायण बलि पूजा इसी पावन पहाड़ी पर संपन्न होती है।
मान्यता अनुसार भगवान श्रीराम ने स्वयं यहां अपने पिता दशरथ का श्राद्ध कर्म संपन्न किया था।
पितरों के देवता भगवान शिव के इस मंदिर में विशेष रुद्राभिषेक एवं पूजा-अर्चना की जाती है।
हर श्रद्धालु के लिए गया जी की यात्रा एक भावनात्मक एवं आध्यात्मिक अनुभव है — हमारा प्रयास है कि प्रत्येक अनुष्ठान पूर्ण श्रद्धा, शुद्धता एवं शास्त्रोक्त विधि से संपन्न हो।
पं. प्रशांत भैया गया जी के परंपरागत गयावाल पंडित परिवार से हैं तथा विगत 15 वर्षों से देश-विदेश के श्रद्धालुओं को पिंड दान, श्राद्ध, तर्पण एवं पितृ दोष निवारण पूजा में मार्गदर्शन दे रहे हैं। विष्णुपद मंदिर के निकट स्थित होने के कारण वे प्रत्येक यजमान को व्यक्तिगत ध्यान एवं संपूर्ण व्यवस्था के साथ पूजा संपन्न कराते हैं।
गया जी में पिंड दान पांच मुख्य चरणों में संपन्न किया जाता है
पूजा प्रारंभ करने से पूर्व यजमान द्वारा पवित्र संकल्प लिया जाता है।
फल्गु नदी में स्नान कर तन-मन की पवित्रता प्राप्त की जाती है।
मंत्रोच्चार सहित पूर्वजों को पिंड अर्पित किए जाते हैं।
पितरों की तृप्ति हेतु जल एवं तिल से तर्पण किया जाता है।
ब्राह्मण भोजन एवं यथाशक्ति दान-पुण्य के साथ पूजा संपन्न होती है।
"प्रशांत भैया ने हमारे पिताजी का पिंड दान अत्यंत श्रद्धा एवं पूर्ण विधि-विधान से करवाया। पूरी प्रक्रिया सरल तरीके से समझाई गई, हम बहुत संतुष्ट हैं।"
"विदेश में रहते हुए भी WhatsApp के माध्यम से पूरी बुकिंग एवं मार्गदर्शन मिल गया। ठहरने से लेकर पूजा सामग्री तक सब व्यवस्था उन्होंने ही करवाई।"
"पितृ दोष निवारण पूजा के बाद परिवार में सुख-शांति महसूस हो रही है। पंडित जी का व्यवहार अत्यंत सरल एवं आत्मीय रहा।"
तिथि निश्चित करने, पूजा सामग्री की जानकारी या किसी भी प्रश्न हेतु हमसे सीधे संपर्क करें — हमारी टीम हर कदम पर आपके साथ है।
विष्णुपद मंदिर के पास, करसिल्ली मोहल्ला, ग्वालियर भवन के बगल में, गया, बिहार – 823003
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